चमोली: आदिगुरु शंकराचार्य कालीन रम्माण में मुखौटा नृत्य ने किया दर्शकों को मंत्रमुग्ध–

by | Apr 25, 2024 | आस्था, चमोली | 0 comments

सांस्कृतिक विश्व धरोहर रम्माण में ढोल-दमाऊ के 18 ताल पर रामायण का नृत्य शैली में किया गया मंचन–

जोशीमठ (चमोली): आठवीं शता​ब्दि में आदिगुरु शंकराचार्य ने हिमालय क्षेत्र में सनातन संस्कृति के प्रचार प्रसार के ​लिए कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित कराए थे। इन्हीं में से एक कार्यक्रम है रम्माण। यह आयोजन आज भी जोशीमठ के समीप सलूड़डुंग्रा गांव में आयोजित होता है। स्थानीय लोग इस आयोजन को आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। बृहस्पतिवार को सांस्कृतिक विश्व धरोहर रम्माण मेले का सलूड़डुंग्रा गांव में आयोजन किया गया। रम्माण में ढोल दमाऊ की थाप पर 18 ताल में नृत्य के माध्यम से रामायण का मंचन किया गया।

भूमियाल देवता मंदिर के प्रांगण में आयोजित मेले में राम, लक्ष्मण, सीमा व हनुमान के पात्रों ने ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य करते हुए रामायण का मंचन किया। जिसमें राम जन्म, सीता स्वयंवर, वन प्रस्थान, सीता हरण, हनुमान मिलन, लंका दहन का वर्णन किया गया।

बीच में दर्शकों के मनोरंजन के लिए मुखौटा नृत्य आयोजित किया गया। जिसमें म्वर-म्वरीण, बणियां-गणियांण, ख्यलारी आदि नृत्य किए गए। मेले के दौरान भूमियाल देवता के पाश्वा ने भी नृत्य किया। उसके बाद माल नृत्य किया गया। जिसमें मल्ल योद्धा मुख्य प्रांगण में पहुंचे और ढोल दमाऊ की थापर ध्वनि गर्जना के साथ युद्ध का प्रदर्शन किया। कुरुजोगी नृत्य के बाद स्वर्ण मृग बध का आयोजन किया गया। अंत में भूमि क्षेत्रपाल देवता पाश्वा पर अवतरित हुए और क्षेत्र में खुशहाली की कामना का सभी भक्तों को आशीर्वाद दिया।

इस मौके पर रम्माण मेले के संयोजक कुशल सिंह भंडारी, भरत सिंह पंवार, रणवीर सिंह, प्रदीप सिंह, रघुवीर नेगी, भरत सिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। इस अनूठे धार्मिक आयोजन को करीब से देखने के लिए श्रद्धालु सलूड़डुंग्रा गांव पहुंचते हैं। कई शोधार्थी छात्र इस आयोजन पर शोध करने के लिए भी पहुंचते हैं।


2009 में रम्माण बना विश्व धरोहर

– अपने आप में मुखौटा नृत्य की अनोखी कला रम्माण को विश्व धरोहर घोषित करने के लिए 2008 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने भारत सरकार को सिफरिश भेजी। जिसके आधार पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में नामांकन के लिए रम्माण का चयन किया। 2009 में यूनेस्को ने इसे सांस्कृतिक विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर दिया।

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