वर्ष 2022 में विधानसभा सामान्य निर्वाचन के दौरान गंगोलगांव क्षेत्र में हुई कथित घटना के संबंध में सुनाया फैसला, पढ़ें पूरी खबर–
गोपेश्वर, 09 सितंबर 2026: जिला एवं सत्र न्यायाधीश बिंध्याचल सिंह की अदालत ने सुनाया फैसला चमोली (गोपेश्वर) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए हरिश रावत सहित नौ अभियुक्तों की अपील स्वीकार कर ली। न्यायालय ने निचली अदालत की ओर से सात अगस्त 2024 को पारित दोषसिद्धि के निर्णय एवं दंड आदेश को निरस्त करते हुए सभी नौ अभियुक्त हरीश रावत, बृजेश उर्फ बृजमोहन राणा, जगदंबा पुरी, मनोज, सचिन राज, मुकेश राणा, प्रवीण कुमार, अरुण बिष्ट और सोनू को आरोपित धाराओं से दोषमुक्त कर दिया। को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
मामला वर्ष 2022 में विधानसभा सामान्य निर्वाचन के दौरान गंगोलगांव क्षेत्र में हुई कथित घटना से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार, तत्कालीन प्रभारी मजिस्ट्रेट की टीम का वाहनों के निरीक्षण के दौरान कुछ व्यक्तियों के साथ विवाद हुआ था। इस मामले में थाना गोपेश्वर में लोक सेवक की ड्यूटी में बाधा डालने, मारपीट, रास्ता रोकने, उपद्रव व धमकी देने के साथ ही आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
विचारण न्यायालय ने अभियुक्तों के विरुद्ध दोषसिद्ध ठहराते हुए कारावास एवं अर्थदंड से दंडित किया था। फैसले के विरुद्ध हरीश रावत समेत नौ अभियुक्तों ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में चुनौती दी। अपील में अभियुक्त पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में विफल रहा है तथा अभियोजन साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास हैं।
अपील पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि घटना के संबंध में अभियोजन के प्रमुख साक्षियों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि घटनास्थल पर मौजूद कथित व्यक्तियों की स्वतंत्र पहचान विधिवत स्थापित नहीं हो सकी। वीडियो एवं फोटोग्राफ संबंधी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को भी विधि के अनुरूप प्रमाणित किए जाने को लेकर गंभीर कमियां पाई गईं।
न्यायालय ने यह भी पाया कि अभियोजन द्वारा घटनास्थल पर मौजूद स्वतंत्र व्यक्तियों तथा मौके पर पहुंचे पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को साक्षी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके अलावा, कोविड-19 संबंधी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के आरोप को भी पर्याप्त साक्ष्य से प्रमाणित नहीं माना गया। इन परिस्थितियों में न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय में तथ्यात्मक त्रुटि एवं विधिक अनियमितता पाते हुए हस्तक्षेप को आवश्यक माना।

