अनसूया माता मंदिर- यहां एक नारी से हारे थे स्वर्ग के तीनों देवता–

by | Dec 16, 2021 | आस्था, चमोली | 0 comments

 

भक्तों का माता अनसूया से होता है आस्था और विश्वास का अटूट संबंध–

मनोज सिंह-

गोपेश्वर। प्राचीन अनसूया माता मंदिर में दो दिनों तक भक्तों का हुजूम उमड़ेगा। सैकड़ों निसंतान दंपति माता के दरवार में संतान कामना लेकर पहुंचते हैं। हर साल दत्तात्रेय जयंती पर अनसूया माता के मंदिर में मेले का आयोजन होता है। माता अनसूया को संतानदायिनी माना जाता है, यही वजह है कि प्रतिवर्ष सैकड़ों श्रद्घालु माता के दरवार में मत्था टेकने पहुंचते हैं। शुक्रवार को बणद्वारा, खल्ला, मंडल, कठूड़, सगर और देवलधार गांव से नव दुर्गा और माता अनसूया की उत्सव डोली मंडल घाटी में अनसूया माता मंदिर के गेट पर पहुंचेंगी और सिरोली गांव में सभी देव डोलियों को सामूहिक अर्घ्य लगाया जाएगा और यहां से एक साथ डोलियां पांच किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर अनसूया माता मंदिर तक पहुंचेंगी। गोपेश्वर नगर से करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मंडल गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर जंगल में प्राचीन अनसूया माता का मंदिर स्थित है। 17 और 18 दिसंबर को मंदिर में मेले का आयोजन होगा। इस मेले को अणसी कौथिग और नोदी कौथिग के नाम से भी जाना जाता है। संतान की कामना लेकर कई बरोही (निसंतान दंपति) मेले में पहुंचते हैं। बरोही रात्रि के समय मंदिर के सभा मंडप में रात को तप कर सो जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि बरोहियों के सपने में आकर माता अनसूया उन्हें संतान का आशीर्वाद देतीं हैं। अनसूया माता मंदिर के साथ ही यहां दत्तात्रेय का भव्य मंदिर भी स्थित है।

–यह है धार्मिक मान्यता–

 –पुराणों में माता अनसूया को सर्वश्रेष्ठ पुत्रदायिनी देवी बताया गया है। मान्यता है कि हिमालय क्षेत्र में महर्षि अत्री ने कई वर्षों तक लंबी तपस्या की तो उनके कठोर तप को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश वहां प्रकट हुए और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। जिस पर महर्षि अत्री त्रिदेवों से बोले कि तपस्या मेरा स्वभाव है। मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि सती अनसूया देवी की कुछ इच्छा हो तो उन्हें वरदान दे सकते हैं। लेकिन माता ने भी कुछ भी मांगने से मना कर दिया, जिस पर तीनों देवों में निराशा का भाव जाग गया। उन्होंने सोचा स्त्री की सबसे बड़ी इच्छा संतान प्राप्ति की होती है। क्यों न इस बारे में पूछ लिया जाए। उन्होंने देवी अनसूया से कहा- संतान की इच्छा तो होगी ही। देवी ने कहा- आप तीनों भी तो मेरे बच्चे हैं। देवों ने इसे अपना उपहास समझा और देवी की परीक्षा लेने की ठानी। उन्होंने माता अनसूया से स्तनपान करने की इच्छा जाहिर की। देवी ने अपने तपोबल से तीनों देवों को शिशु बना दिया और उन्हें अपनी गोद में लेकर स्तन पान कराया। तब तीनों देवों को सत्य की अनुभूति हुई। उन्होंने माता से क्षमा याचना की। तब ब्रह्मा ने चंद्रमा के रुप में, शिव ने दुर्वासा और विष्णु ने दत्तात्रेय के रुप में माता अनसूया की कोख से जन्म लिया। जिसके बाद माता अनसूया संतानदायिनी के रुप में विख्यात हुई। इसी के कारण प्रतिवर्ष दत्तात्रेय जयंती पर माता अनसूया का मेला आयोजित किया जाता है। 

माता अनसूया मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद सिंह राणा, सचिव दिगंबर बिष्ट, सुनील बिष्ट, पूर्व प्रमुख भगत सिंह बिष्ट, सिरोली की प्रधान आरती देवी, बैरागना की प्रधान आशा देवी, बणद्वारा की प्रधान सरोजनी देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य राकेश सिंह और राजेंद्र सिंह बिष्ट ने सभी भक्तों को माता अनसूया मंदिर में पधारने का आह्वान किया है। 

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