ऋषि गंगा की जलप्रलय का एक साल- रैणी और तपोवन गांव के लोगों को डरा रही है ये धौली गंगा–

by | Feb 6, 2022 | आपदा, चमोली | 0 comments

ऋषि गंगा की आपदा को हुआ एक साल, आज भी धौली और ऋषि गंगा के किनारे जाने से डरते हैं तपोवनी और रैणी क्षेत्र के ग्रामीण– 

चमोलीः नीती घाटी के साथ ही उत्तराखंड को हिला देने वाली ऋषि गंगा की आपदा को सोमवार को एक साल पूरे हो जाएंगे। आज भी इस आपदा की याद आती है तो लोगों की रूह कांप जाती है। कैसे चटख धूप और बिना बारिश-बर्फबारी के धौली गंगा में सैलाब उमड़ पड़ा था।

लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि शांति और निश्छल बहने वाली ऋषि गंगा और धौली गंगा इतना कहर बरपाएगी। अभी भी सतर्क रहने की जरुरत है। शासन-प्रशासन तो अभी तक भी आपदा से कोई सबक नहीं ले पाए, लेकिन पहाड़ में निवास करने वाले वाशिंदों को अब सजग और चौकन्ना रहने की जरुरत है। इस जलप्रलय को याद करते ही आज भी रैणी और तपोवन घाटी के ग्रामीणों की रूह कांप जाती है।

आज भी ग्रामीण धौली और ऋषि गंगा के किनारे जाने से डर रहे हैं। आपको याद होगा किया सात फरवरी 2021 को सुबह करीब सवा दस बजे ऋषि गंगा के उद्गम पर अचानक ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूट गया था, जिससे निचले क्षेत्रों में जलप्रलय की स्थिति पैदा हो गई। ऋषि गंगा के मुहाने पर स्थित संपूर्ण ऋषिगंगा जल विद्युत परियोजना मलबे में दफन हो गई थी और तपोवन जल विद्युत परियोजना के बैराज और टनल में मलबा घुस गया था। इस आपदा में 206 लोग लापता हो गए थे।

अभी तक 135 शव और मानव अंग बरामद हुए थे। जोशीमठ की एसडीएम कुमकुम जोशी ने बताया कि सभी 206 लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र तहसील प्रशासन की ओर से दे दिए गए हैं। शासन की ओर से मृतकों के आश्रितों को 7 लाख रुपये मुआवजा भी दे दिया गया है। आपदा को एक वर्ष का समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक भी रैणी क्षेत्र में आपदा के जख्म हरे हैं। ऋषिप्रयाग तक जाने के लिए भी पैदल रास्ता नहीं बन पाया है। ग्रामीण को प्रयाग पर शवदाह करने के लिए जाने का रास्ता भी नहीं बचा है। भूस्खलन और भू-कटाव से मलारी हाईवे कई जगहों पर धंस गया है। इसका सुधारीकरण कार्य भी अभी तक शुरू नहीं हो पाया है।

रैणी गांव के ग्राम प्रधान भवान सिंह राणा और पल्ला रैणी की प्रधान शोभा राणा ने बताया कि क्षेत्र में पैदल रास्ते अभी भी क्षतिग्रस्त पड़े हैं। ऋषि गंगा के किनारे बाढ़ सुरक्षा कार्य भी नहीं हुए हैं। आज भी ग्रामीण नदी किनारे जाने से डरते हैं। इस आपदा में आए सैलाब का असर मछली कारोबार पर भी पड़ा है। जल सैलाब के साथ आए गाद से अलकनंदा नदी की मछलियां मर गई थी, जोशीमठ से लेकर कर्णप्रयाग तक अलकनंदा नदी के किनारे लाखों मछलियां तड़प-तड़प कर मर गई थी, तब से नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, लंगासू, छिनका और चमोली बाजार में मछली का कारोबार उभर नहीं पाया है। इन जगहों पर मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाले परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहरा गया है।

कई परिवार अलकनंदा नदी से मछली पकड़कर बाजारों में बेचते थे, जिससे उनकी गुजर बसर होती थी, लेकिन अब उनके रोजगार का जरिया भी सैलाब के साथ तबाह हो गई है। अब एनटीपीसी 24 घंटे अलकनंदा और धौली गंगा के जलस्तर पर नजर बनाए हुए है। एनटीपीसी के महाप्रबंधक आरपी अहिरवार ने बताया कि नदियों के जलस्तर पर नजर रखने के लिए सुरांईथोटा, रैणी और गोविंदघाट में कर्मचारियों की तैनाती की गई है, जो 24 घंटे नदियों के जलस्तर पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने बताया कि जल्द ही नदियों के जलस्तर की रिपोर्ट ऑनलाइन मिलनी शुरू हो जाएगी, जलस्तर की जांच के लिए निश्चित जगहों पर सेंसर स्थापित किए जाएंगे। 

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