बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में पित्र तर्पण करने पहुंच रहे विदेशी तीर्थयात्री–
चमोलीः बदरीनाथ धाम में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित ब्रह्मकपाल में तीर्थयात्री अपने पित्रों को तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मकपाल में पित्रों के निमित किया पिंडदान गया से आठ गुणा फलदायी है। यही वह तीर्थ भी है जहां पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव जी को भी आना पड़ा था। इन दिनों बदरीनाथ धाम के दर्शनों के साथ ही ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने के लिए विदेशी तीर्थयात्री भी पहुंच रहे हैं। इटली के तीर्थयात्री ब्रह्मकपाल में अपने पित्रों के पिंडदान के लिए पहुंचे हुए थे। अब विदेशी श्रद्घालु भी भारतीय धार्मिक संस्कृति को अपनाने लगे हैं, एक विदेशी तीर्थयात्री ने स्थानीय निवासी को बताया कि उन्होंने इंटरनेट पर ब्रह्मकपाल के बारे में पढ़ा और सुना था, जिसके बाद यहां आने का कार्यक्रम बनाया।
कहते हैं कि श्राद्ध पक्ष में ब्रह्मकपाल में पित्र तर्पण करने से वंश वृद्धि होती है। बदरीनाथ के मुख्य धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। उन्होंने बताया कि पुराणों में वर्णित है कि सृष्टि की उत्पत्ति के समय जब तीन देवों में एक ब्रह्मा मां सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए तो भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के तीन सिरों में से एक को त्रिशूल के काट दिया तो सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया।
ब्रह्मा हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से करीब 200 मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया तभी से यह स्थान ब्रह्मकपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। यह भी कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों का वध कर विजय हासिल की थी तो गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पित्रों को तर्पण दिया था।

