चमोली: सजने लगा मां नंदा का धाम सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर, गेंदे के फूलों से सजाया जा रहा मंदिर–

by | Sep 2, 2026 | आस्था, चमोली | 0 comments

3 से 5 सितंबर तक आयोजित होगा नंदा मेला, पांच सितंबर को कैलाश के लिए विदा होंगी कुरुड़, बंड और राजराजेश्वरी की डोलियां–

नंदानगर (चमोली)। मां नंदा की बड़ी जात को लेकर सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर में तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। मंदिर परिसर को सात क्विंटल गेंदे के फूलों से सजाया जा रहा है। वहीं मंदिर में रंग-रोगन का कार्य भी लगभग पूरा हो चुका है। नंदानगर-रामणी मोटर मार्ग से कुरुड़ मंदिर तक करीब 400 मीटर आस्था पथ का नव निर्माण भी कर दिया गया है।

कुरुड़ मंदिर में तीन से पांच सितंबर तक नंदा मेला आयोजित किया जाएगा। मेले में स्कूली बच्चों और महिला मंगल दलों की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे। पांच सितंबर को बंड, दशोली और राजराजेश्वरी क्षेत्र की मां नंदा की डोलियां विभिन्न पड़ावों से होते हुए कैलाश के लिए रवाना होंगी।

राजराजेश्वरी नंदा की डोली अपने पहले पड़ाव चरबंग, दशोली की डोली कुमजुग और बंड क्षेत्र की डोली मैठाणा पहुंचेगी। इसके बाद तीनों डोलियां 15 सितंबर को लाटू देवता मंदिर वाण पहुंचेंगी।

20 को होमकुंड में पूजा अर्चना के बाद विदा होगा चौसिंग्या खाडू

मां नंदा की बड़ी जात पांच सितंबर को कुरुड़ मंदिर से प्रस्थान कर विभिन्न पड़ावों से होते हुए 12 सितंबर को रामणी गांव पहुंचेंगी। यहां फरस्वाणफाट के जाख देवता, त्यूणा रचकोटी, दशमद्वार काली, बंड, लाता, बदरीनाथ की डोली और छंतोलियों का मिलन होगा। उसके बाद आला, सितेल, कनोलपड़ाव से होते हुए 15 को जात लाटू देवता के मंदिर वाण पहुंचेगी। यहां से जात रणकधार और गैरोली पातल होते हुए 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां मां नंदा की सप्तमी की पूजा आयोजित होगी। 19 को जात बगुवावासा, पातर नचौणिंया, कैलवा विनायक, रुपकुंड, ज्योंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेंगे। 20 सितंबर को होमकुंड में मां नंदा की पूजा और चौसिंग्याखाडू की विदाई होगी। उसी दिन श्रद्धालु वापस रात्रि प्रवास के लिए जामुनडाली नामक स्थान में पहुंचेंगे। 30 सितंबर को मां नंदा की डोली सुतोल, पैरी, सितेल, गुलाड़ी, नारंगी, फरखेतपड़ाव होते हुए सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर में पहुंचेगी। इसी के साथ मां नंदा की बड़ी जात का समापन भी हो जाएगा।

श्रद्धालुओं के लिए पंजीकरण की बाध्यता नहीं

बड़ी जात आयोजन समिति के अध्यक्ष कर्नल (सेनि.) हरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि बड़ी जात में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं के पंजीकरण की कोई बाध्यता नहीं है। श्रद्धालु विभिन्न पड़ावों से यात्रा में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी व्यवस्थाओं के साथ जात में शामिल होने और जरूरी दवाइयां साथ रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि कमजोर और अस्वस्थ श्रद्धालु उच्च हिमालयी क्षेत्र तक न जाएं और निचले क्षेत्रों में ही मां नंदा के दर्शन करें।

उन्होंने कहा कि यह मां नंदा भगवती की यात्रा है, इसमें किसी व्यक्ति विशेष का कोई स्थान नहीं है। मां नंदा की डोली को कैलाश तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सभी की है, जिसे पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ निभाया जाएगा। जात में सभी देवी-देवताओं का सम्मान किया जाएगा और गांवों में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन होगा। उन्होंने सभी लोगों से एक समुदाय की भावना के साथ जात में शामिल होने तथा आपसी सद्भाव और मां नंदा के सम्मान को बनाए रखने का आह्वान किया।

पुलिस प्रशासन की ओर से भी यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तैयारियां की जा रही हैं।

उच्च हिमालय में पर्यावरण संरक्षण की अपील

बड़ी जात आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं से उच्च हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखने की अपील की है। समिति ने कहा कि यात्रा के दौरान निकलने वाला कूड़ा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में न छोड़ें। इससे हिमालय की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। श्रद्धालुओं से प्राकृतिक सुंदरता से छेड़छाड़ न करने और ब्रह्मकमल समेत अन्य वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाने की अपील की गई है।

ऐसे पहुंचें मां नंदा के सिद्धपीठ कुरुड़

सिद्धपीठ कुरुड़ पहुंचने के लिए ऋषिकेश से बस या टैक्सी के माध्यम से करीब 190 किलोमीटर की दूरी तय कर बदरीनाथ हाईवे पर नंदप्रयाग पहुंचा जा सकता है। नंदप्रयाग से स्थानीय वाहनों के जरिए 19 किलोमीटर दूर नंदानगर पहुंचा जा सकता है। नंदानगर से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर स्थित है। कुरुड़ में ठहरने और भोजन की सीमित व्यवस्था होने के कारण श्रद्धालुओं को रात्रि प्रवास के लिए नंदानगर बाजार में ठहरने की सलाह दी गई है। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर पड़ाव समितियों और महिला समूहों की ओर से श्रद्धालुओं के लिए भोजन व ठहरने की व्यवस्था की जाती है।

बड़ी जात आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं से उच्च हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखने की अपील की है। समिति ने कहा कि यात्रा के दौरान निकलने वाला कूड़ा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में न छोड़ें। इससे हिमालय की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। श्रद्धालुओं से प्राकृतिक सुंदरता से छेड़छाड़ न करने और ब्रह्मकमल समेत अन्य वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाने की अपील की गई है।

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